अध्याय 61

जूनिपर चौंक गई, मगर फिर भी हार मानने को तैयार नहीं थी। वह मुझे ज़हर भरी नज़रों से घूरती रही, मानो मुझे चीरकर कच्चा ही खा जाएगी।

उसने होंठ काट लिया; उसकी उँगलियाँ इतनी ज़ोर से भींची हुई थीं कि सफ़ेद पड़ गईं। काफ़ी देर बाद जाकर उसने मन मसोसकर, अनिच्छा और शिकायत से भरा एक माफ़ीनामा जैसे-तैसे उगला। उसक...

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